Printed T-shirt of Dr. Ambedkar Call 8851188170, 8527533051

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Dr Ambedkar aur Bauddh Dhamm par pustak call 8851188170, 8527533051

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Dr. Ambedkar ji ki sankshipt jivani aur unke sandeshon par pustak call M. 8527533051, 8851188170

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Dr. Ambedkar ji Ki Prachar Samgri List-1

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Dr. Ambedkar, Bhagwan Buddha aur Guru Ravidas ji ji Ki Prachar Samgri List-2

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List-3 Dr. Ambedkar, Bhagwan Buddha aur Guru Ravidas ji ji Ki Prachar Samgri

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List-4 Dr. Ambedkar, Bhagwan Buddha aur Guru Ravidas ji ji Ki Prachar Samgri

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List-5 Dr. Ambedkar, Bhagwan Buddha aur Guru Ravidas ji ji Ki Prachar Samgri

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Hindi Books of Dr. Ambedkar

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Polo T-shirt, Printed, Coloured, of Dr. Ambedkar and Coustamized

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शनिवार, 18 अगस्त 2012

भाग एक : "देव नगर"

बचपन दिल्ली के देव नगर के अपने नाना ज्ञान चन्द के मकान में शुरू किया। अच्छा बड़ा कमरा था पर मेरी नज़र आस पास के मकानों पर रहती थी। बड़ा हुआ तो पता चला कि वह मकान पंजाब से आए शरणार्थियों के थे। बहुत बढ़िया मकान थे। बड़ा गेट, खूब पेड़ पौधे और गाड़ी भी खड़ी होती थी। अभी कुछ दिनों पहले माँ ने बताया कि वह मकान पहले चमारों को अंग्रेजों के ज़माने के मिले हुए थे। वह गरीब और अनपढ़ थे। शादी ब्याह कर्ज़ा ले कर करते थे। बहुत कम पैसे में पंजाब से आए खत्री शरणार्थियों को गिरवी रखा थे। न अक्ल, न पैसा, न शिक्षा और न ही सामाजिक रूतबा और दब दबा। वहीं पंजाब से आए खत्री भले ही शरणार्थी हों पर उनके पास अच्छा पैसा, शिक्षा, वह भी काम धंधे की और सामाजिक रूतबा और दब दबा, सब था। हाँ सामाजिक भावना नहीं, पर लालच था। मकान गए, फिर पता नहीं वह चमार कहाँ चले गए। माँ इतना ही जानती है।

नाना जी की सरकारी नौकरी थी। पता नहीं क्या पर गाड़ी जरुर घर के सामने खड़ी होती थी। रोज सुबह वह ऑफिस जाने से पहले मुझे और अपने भाई ईश्वर चन्द खोरवाल के बच्चों को गाड़ी की एक छोटी सैर पर ले जाया करते थे। उनके तीन बच्चे थे - सबसे बड़ी लड़की बाला जो कि अभी पैंतीस की हो गई होगी और उसकी अभी तक शादी नहीं हुई है, उससे छोटा लड़का काकू जिसका कि मुख्य नाम शायद मुकेश था और जो कि जवानी शुरू करने से पहले ही शराब और गुटखे की लत से मर गया, पर मेरे हिसाब से वह गरीबी, अक्षिक्षा और कमजोर सामाजिक चेतना का शिकार हो कर मरा और ऐसे ही कितने दलित युवक जवानी पूरी करने से ही पहले मर जाते हैं। सुना है कि हमारी रैगर जाति में पहले काफी चेतना थी। शायद इसका कारण आर्थिक बल था। माँ बताती है कि देव नगर अंग्रेजों के बसाए हुए थे जिससे कि चमड़े का काम कर सकें। पहले सारे देव नगर में चमड़े की खाले लटकी होती थी। हमारी जाति के लोग खालों के बड़े सेठ व्यापारी थे। बाद में जब हिन्दू विभाजन के बाद आए तो उन्होंने नाक मूँह बनाना शुरू कर दिया। अंग्रेजों का राज जा चुका था और अब सत्ता ब्रहामणों की कांग्रेस सरकार के हाथ में थी। हम हिन्दुओं के हिसाब से छोटी जाति के हैं। पर सच तो यह है कि जब हम हिन्दू ही नहीं है तो जात कहाँ से आ गई और छोटे कैसे हो गए ? समय के साथ जब मैं बड़ा हुआ तो उन लोगों के संपर्क में आया जिन्हें ऊँची जात का कहा जाता है पर वह सब मुझे अजीब से लगे। किसी पर पैसा अत्याधिक हावी था, किसी पर रुतबे की चाह, कोई कामुकता का मारा तो कोई ग्रहों नक्षत्रों का। कोई भी सामाजिक नहीं था। सब परेशान। हमारे लोगों को देव नगर से बीस किलोमीटर काम के लिए खदेड़ दिया। दूसरे हिन्दुओं की सामाजिक साजिश का हथियार आर्य समाज, अर्थात हिन्दू बनने की सदस्यता, जिसकी कि कीमत थी कि इनकी गुलामी। हमारे कुछ मूर्ख लोग इनके इस षड्यंत्र का शिकार हो गए। समझ नहीं पाए कि मांस, जानवर और चमड़ा उनकी कितनी बड़ी ताकत थी और छोड़ दिया उस काम को। बन गए इनके गुलाम। वह तो डॉ. भीम राव आंबेडकर जी की बदौलत कुछ लोगों को सरकारी नौकरियाँ मिल गई वरना उस समय में खत्रियों ने जिस रफ़्तार से और धर्म की सहायता से दिल्ली की ज़मीन, काम धंधों और सरकारी नौकरियों पर कब्ज़ा जमाया था, भंगी, रैगर, चमार, खटीक, धोबी, पासी, डोम, आदि शायद आज वैसे ही होते जैसे कि सांसी, नट आदि लोगों का हाल है जिन्हें कि न ही तो अंग्रेज राज की मदद मिली और न ही डॉ. आंबेडकर और न ही कोई मजबूत दलित समाज। पहले अगर दलित समाज हिन्दुओं का गुलाम था और अपने समाज के लिए कुछ नहीं कर पाता था तो अब वह सरकारी नौकरियों का गुलाम बन चुका था। दलितों के ज्यादातर उन काम धंधों को जिससे कि वह मजबूत बनते थे धार्मिक षड्यंत्र के जरिए उन्हें सामाजिक बहिष्कार का डर दिखा कर खुद ही छोड़ने पर मजबूर कर दिया गया और वह जिनसे न ही तो कोई मजबूती आती थी और जो कि शारीर के लिए घातक थे जैसे कि सफाई का काम, ऐसे काम यह कह कर सामाजिक रुतबे का प्रलोभन दे कर करवाए गाए कि इनसे बढ़ कर तो दुनिया में कोई दूसरा कम नहीं है। कौन कहता है कि आरक्षण ख़त्म होगा। जब तक रहेगा दलित हिन्दुओं के गुलाम रहेंगे। अब यह किसी काम के नहीं रहे। इनमें से अधिक्त्तर व्यापार धंधे के लायक नहीं है। न इनके पास धन है न सामाजिक चेतना। न दिशा है न डॉ. आंबेडकर।

तो हम सभी को गाड़ी की सैर में बड़ा मज़ा आता । ईश्वर जी, जो कि अभी जीवित ही हैं और सुना है कि जयपुर में घाट गेट के रैगरों के मोहल्ले वाले उस एक छोटे से कमरे में अपने जीवन के दिन गुजार रहे है जहाँ उनके माता पिता ने नलकों की ठेकेदारी का काम छोड़ कर कबाड़ी का काम करते हुए अपनी जिन्दगी बिताई और फिर वह कुछ सालों में हमारी माँ की एक बुआ का और उनके कुछ बच्चों का भी आसरा बनाकी एक छोटी पुत्री भी है, जिसे कि कोचरी बुलाते थे। उसके बारे में मुझे कुछ पता नहीं। वह तब बहुत ही छोटी थी। उसे भी सैर में बड़ा मजा आता था। मेरा स्कूल ग्रे फिल्ड नाम का एक छोटा सा स्कूल था जो कि आज भी चना मार्किट में है और अब स्प्रिंग्द्ल्स बन गया है। स्कूल कोई गोरे रंग की और पतले चेहरे की पैने नैन नक्शों वाली महिला चलाती थी जो कि प्रधानाचार्या भी थी। मैं रोज सुबह उन्हें इंग्लिश में गुड मार्निंग की जगह तुतला कर डुड मार्निंग कह देता था। वह काफी अच्छी और प्यार के स्वाभाव वाली महिला थी। स्कूल मानों बस कमरों का कैदखाना हो। न खेल का मैदान न दौड़ने भागने की जगह। बच्चे भी बहुत ही शरारती। ऐसे ही एक डिब्बे नुमा रिक्शे से घर पर लाद दिया जाता। घर का छोटा कमरा, स्कूल  की क्लास का छोटा कमरा और रिक्शे का छोटा डिब्बा। पर एक दिन घर वाले एक दूसरी जगह ले गए। मुझे रात की याद है। ऊपर एक छोटा सा कमरा जिस पर पलस्तर भी नहीं था। खुले बिजली के तार के सहारे एक बल्ब पिली रौशनी दे रहा था। कमरे में एक पढने की टेबल और एक कुर्सी थी। एक मूंछों वाला आदमी था। बताया गया कि वह मेरा बड़ा मामा है। मुझे समझ नहीं आया कि यह मामा कहाँ से आ गया। असल में वह पढाई के लिए उसी मकान में रह कर पढ़ रहे थे।


बीच की कुछ यादें हैं पर निकालना मुश्किल है। बस इतना याद है कि एक दिन नाना जी के साथ में देव नगर वाले मकान पर उनकी जीप में गया जहाँ उन्होंने अपने उस कमरे को ताला लगा दिया जिसमें हम रहते थे। कुछ बात अपने छोटे भाई ईश्वर के साथ की और हम वहाँ से चल दिए। नाना जी रात में मालिश वाले से मालिश करवाते थे। अच्छे इस्त्री किए हुए सफारी सूट पहनते थे। पास में एक नाई था जिससे कि से अक्सर बाल कटवाते थे। आँगन कमरे से बड़ा था जिसमें जलेबे (शहतूत) का पेड़ था जिस पर मोटे-मोटे काले जलेबे (शहतूत) लगते थे। घर के आगे बड़ा रोड़ था जिसका नाम टैंक रोड़ है। घर के सामने नाथी नानी रहती थी जिसे कि नाथी खटीकनी के नाम से पुकारा जाता था। खटीक मांस का काम करने वाले को कहते हैं। नाथी नानी बहुत बढ़िया मीट की भाजी बनाती थी। सिरी, पाए, फेफड़े अदि। मुझे तो प्यार से सीरी (बकरे या भेड़ का मूँह) की उतरी दुनी (भुनी) हुई खाल खाने को देती जिसके पैसे भी नहीं लेती। मै बड़े चाव से खाया करता था। बचपन से मुझे दूध और मांस का बड़ा शौक है। हम वहाँ खूब होली मनाते थे जो कि मैं अब नहीं मानता। आदमी प्रेम में पागल से हो कर कैसे औरतों के साथ होली खेलते थे और शायद औरतों को भी वह अच्छा लगता था। पर हिदुओं के इन त्यौहारों का दलितों के बीच में प्रचलन हिंदी फ़िल्में देख-देख कर ज्यादा हुआ है और हिंदी फिल्मों के अधिकतर लेखक और निर्देशक ब्रहामण हुए हैं जिन्होंने किसी मिशनरी की भांती जाने अनजाने में अपने धर्म का प्रचार किया। तो इतना सबकुछ छोड़ कर नाना जी वहाँ से जा रहे थे। मेरा मन उस समय उदास था। मुझसे मेरा संसार छिन्न रहा था। बाद में नाना जी के मँझले भाई सूरजभान ने ताला तोड़ कर उस कमरे पर भी कब्ज़ा कर लिया और फिर बाद में उससे छोटे सुरेश ने तो वह हड़प ही लिया। बीस साल तक केस चला, एक सरदार खत्री वकील  ने नाना जी की कमाई का मोटा हिस्सा हड़पा। पर सच तो यह है कि हमारे नाना जी एक असली दलित थे जो कि सबके द्वारा मूर्ख बना दिए जाते थे। जिंदगी भर उन्हें रूपये पैसे से ज्यादा गम इस बात का रहा कि भाई-भाई न रहा और न बहन-बहन न रही। जमाना बदल चुका था। अब समाज नहीं था। सिर्फ पैसा। और ऊपर से कांग्रेसी सरकार और उसकी दमनकरी ब्रह्माणवादी नीतियाँ।

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