Printed T-shirt of Dr. Ambedkar Call 8851188170, 8527533051

Printed T-shirt of Dr. Ambedkar Call 8851188170, 8527533051

Dr Ambedkar aur Bauddh Dhamm par pustak call 8851188170, 8527533051

Dr Ambedkar aur Bauddh Dhamm par pustak call 8851188170, 8527533051

Dr. Ambedkar ji ki sankshipt jivani aur unke sandeshon par pustak call M. 8527533051, 8851188170

Dr. Ambedkar ji ki sankshipt jivani aur unke sandeshon par pustak call M. 8527533051, 8851188170

Dr. Ambedkar ji Ki Prachar Samgri List-1

Dr. Ambedkar ji Ki Prachar Samgri List-1

Dr. Ambedkar, Bhagwan Buddha aur Guru Ravidas ji ji Ki Prachar Samgri List-2

Dr. Ambedkar, Bhagwan Buddha aur Guru Ravidas ji ji Ki Prachar Samgri List-2

List-3 Dr. Ambedkar, Bhagwan Buddha aur Guru Ravidas ji ji Ki Prachar Samgri

List-3 Dr. Ambedkar, Bhagwan Buddha aur Guru Ravidas ji ji Ki Prachar Samgri

List-4 Dr. Ambedkar, Bhagwan Buddha aur Guru Ravidas ji ji Ki Prachar Samgri

List-4 Dr. Ambedkar, Bhagwan Buddha aur Guru Ravidas ji ji Ki Prachar Samgri

List-5 Dr. Ambedkar, Bhagwan Buddha aur Guru Ravidas ji ji Ki Prachar Samgri

List-5 Dr. Ambedkar, Bhagwan Buddha aur Guru Ravidas ji ji Ki Prachar Samgri
Jai Bhim Flags, Panchsheel flags

Hindi Books of Dr. Ambedkar

Hindi Books of Dr. Ambedkar

English Books of Dr. Ambedkar

English Books of Dr. Ambedkar

Polo T-shirt, Printed, Coloured, of Dr. Ambedkar and Coustamized

Polo T-shirt, Printed, Coloured, of Dr. Ambedkar and Coustamized

सोमवार, 20 अगस्त 2012

भाग दो : "नौ सौ सतरह"

देव नगर छोड़ कर एक नई दुनिया में प्रवेश किया। उस दिन नाना जी के साथ देव नगर के कमरे को ताला लगाने और फिर उसके बाद नई जगह में रहने चले जाने की यादें बहुत गहराई में दबी पड़ी हैं। याद आता है कि नाना जी की मेटाडोर में बैठ कर मैं वहाँ गया था। उस समय की जो यादें हैं उनमें कुछ ख़ास है नौ सौ सतरह (917)। नौ सौ सतरह उन दिनों डी टी सी की बस मादी पुर से देव नगर के बीच चला करती थी। यादों को भी शायद जगह की उतनी ही जरूरह होती है जितनी कि इंसान को। जैसे इन्सान का जिस्म खुल्ली जगह पर आनंदित हो जाता है, बड़ी और विशाल जगहों को देख कर झूम जाता है, वैसी ही इंसान की यादें भी होती हैं। जैसे किसी तंग जगह पर इंसान का शरीर घुटने लगता है और वहाँ से दूर भागने के लिए छटपटाने लगता है शायद वैसी ही यादें भी हैं। यादों को भी खुल्लेपन का एहसास चाहिए होता है। इसीलिए उस दिन देव नगर छोड़ने के बाद की मेरी जो यादें हैं उनमें भी पिछली यादों में है मादी पुर का बस स्टैंड और नौ सौ सतरह बस नंबर।

रोज सुबह मम्मी ऑफिस के लिए तैयार हो कर मुझे भी अपने साथ स्कूल छोड़ने के लिए ले जाती जो कि अभी वहीं चना मार्किट वाला था। शायद उन्हीं दिनों मुझे यह पता चला कि मेरा स्कूल चना मार्किट में है। सुबह-सुबह तैयार हो कर मैं और मम्मी डी टी सी के बस स्टैंड पर आ जाते। बस स्टैंड बहुत बड़ा और खुल्ला-खुल्ला लगता था। शायद उसी समय मैंने डी टी सी बस में सफ़र करना शुरू किया था। वह बड़ी-बड़ी सी लगती थी। मुझे डरावनी पर अच्छी लगती थी। सुबह-सुबह स्टैंड के एक तरफ लोग नौ सौ सतरह बस के लिए लाईन लगाते थे तो दूसरी तरफ किसी और के लिए। बड़ा हुआ तो पता चला कि दूसरी तरफ लोग नौ सौ चौहत्तर के लिए लाईन लगाते थे जो कि डॉ. अम्बेडकर नगर जाती थी। तब मैंने पहली बार अम्बेडकर शब्द सुना था। जब कभी मम्मी यह बताया करती कि कैसे हिन्दुओं के हम से और हमारे चमड़े के काम से घृणा करने के कारण चमड़े की बनाई और रंगाई का काम देव नगर से बन्द करवा दिया गया था और हिन्दुओं के सामाजिक बहिष्कार और घृणा से तंग आ कर कुछ लोगों ने यह काम सदा के लिए छोड़ दिया था तब वह डॉ. अम्बेडकर नगर का भी जिक्र करती कि चमड़े के काम को ब्रहामणों की काँग्रेसी सरकार ने वहाँ तब्दील कर दिया। पर दूर होने की वजह से बहुत से रैगर और चमार जो कि इस काम को कर रहे थे और बहुत अच्छी कमाई कर रहे थे, उनके लिए दूर जा कर काम करना मुनासिब न रहा। हर काम धंधे के अपने-अपने सन साधन होते हैं और काम को उजाड़ना लोगों को उजाड़ने के बराबर है। पर काँग्रेस सरकार उन हिन्दुओं का नेतृत्व करती है और सत्ता हासिल करने के लिए दलित आदिवासी और पिछड़े सम्माज को मूर्ख बनाती है। तो वह सब लाईन लगा कर नौ सौ चोहत्तर में चढ़ कर डॉ. अम्बेडकर नगर चमड़े का काम करने जाते थे। बाद में मेरे एक बचपन के चमार मित्र ने बताया था कि उनके बहुत से रिश्तेदार डॉ. अम्बेडकर नगर रहते थे। दो साल पहले मैं दलित लेखक डॉ. एस एल धनी जी से मिलने गया। वह भी चमार हैं। उनके घर जाते हुए मैंने कई सालों बाद बसों पर अम्बेडकर नगर लिखा हुआ देखा। लगभग बीस साल बाद। सारी यादें दिमाग में घुमड़ पड़ी। और अब मैं डॉ. आंबेडकर जी से न सिर्फ परिचित था बल्कि उनके अनके लेखों का अध्यन्न करते-करते काफी सारी बातें समझने भी लगा था। मेरी नज़रों ने उन बसों में से नौ सौ चोहत्तर नंबर की बस को खोजना चाहा पर वह नहीं मिली, फिर सोचा कि शायद नंबर बदल गया हो, तो खोजना चाहा कि शायद किसी पर मादी पुर लिखा हो। पर वह भी नहीं मिला। संपर्क टूट चुका था। मादी पुर और डॉ. अम्बेडकर नगर का। मादी पुर, डॉ. अम्बेडकर नगर और देव नगर का। दिल्ली बदल गई है। जहाँ कभी दलितों की जातियां न सिर्फ मेहनत मजदूरी करती थी बल्कि व्यापार धंधा भी करती थी वह दलितों कि दिल्ली उजड़ चुकी है। दिल्ली का यह इतिहास आज मैं पहली बार लिख रहा हूँ। दलितों का दिल्ली का इतिहास भी शाद मैं ही आज पहली बार लिख रहा हूँ। मैं दलित हूँ। दर्द सहा है। यह लेखन उसकी पीड़ा है। दलित दबा है पर ख़त्म नहीं हुआ है। कहते हैं कि दिल्ली सात बार उजड़ी। पर शायद कितनी ही बार और। दलितों की दिल्ली का इतिहास नहीं है। दलितों को कितनी ही बार उजाड़ा गया। पर एक और दिल्ली बसी है। डॉ. अम्बेडकर नगर के ईर्द-गिर्द दो बातें उभर कर आती है। एक तो है भारत के दबे कुचले समाज बहुसंख्यक दलित और पिछड़े समाज की बहुसंखया ज़रा सी जगह पर छोटे-छोटे घरों, तंग गलियों वाले मौहल्लों जिनकी की कभी मरम्मत नहीं की जाती, में घुट-घुट कर रहना। कुछ मकान ठीक-ठाक हैं तो गलियाँ तंग और खस्ता हालात में हैं। कुछ मौहल्ले बहुत ही छोटे-छोटे मकानों के काँग्रेस पार्टी द्वारा बसाए हुए हैं। शायद यहाँ स्मृतियाँ जन्म नहीं लेती। पर जो दूसरी घृणास्पद बात नज़र आती है वह है हिन्दू, सिखों और जैनियों के बड़े-बड़े फार्म हाउस जो कि इस इलाके का इतना बड़ा हिस्सा कब्जाए बैठे हैं जिसमें कि दलित और पिछड़े समाज की कई जातियों के लाखों लोग रहते हैं, और उनके इलाकों से भी बड़े, इन फार्म हाउसों के इलाके में एक हज़ार लोग भी नहीं रहते। पर एक तीसरी बात भी जो डॉ. अम्बेडकर नगर इलाके के ईर्द-गिर्द देखने को मिलती है, वह है सेना की छावनियां और प्रशिक्षण शिविर। पर यह सेना किसकी सुरक्षा कर रही है ? भारत के बहार के किसी और आक्रमणकारी की या इन फ़ार्म हाउसों में रहने वालों की। अभी हाल ही में किसी अदालत ने दिल्ली के दौ सौ चालीस फार्म हाउसों को नियमित कर दिया है। ऐसा कौनसा नियम है जो कि यह कहता है कि लाखों इंसानों के रहने की जगह में एक हज़ार इंसानों को रहने की जगह दी जाए ? जस्टिस वी आर कृष्ण अय्यर (जो कि ब्राह्मण हैं) ने अपनी एक पुस्तक में जिक्र किया है कि कैसे सुप्रीम कोर्ट के बहुत से जजों ने दक्षिणी दिल्ली में बनी बड़ी-बड़ी कोठी वाले मौहल्लों के मुकद्दमों में न सिर्फ गैर जिम्मेवारना बल्कि अपराधिक रवैया अपनाया और अपने ऊंचे रुत्बों का फायदा उठा कर दिल्ली में बड़ी-बड़ी जगह वाले मौहल्ले बनाने वालों को, कानून का संरक्षण इसीलिए दिया क्योंकि इनमें से कई घर भारत के प्रमुख जजों के थे। उन्होंने जातिवाद की भी निंदा की, पर चूक गए कि इसका बड़ा कारण जातिवाद ज्यादा है। ऊँची जाति अर्थात हिन्दू, समाज के शोषकों का गुट है जो कि दलित, आदिवासी और शूद्रों का शोषण करते हैं।  समाज के इन तीन चीथड़ों की तरक्की का अर्थ है कि वह कहीं न कहीं शोषक बन जाता है। जैसे कि कोई शुद्र पिछड़ा यादव इंडस्ट्री लगाता है तो उसे मशीनों पर काम करने के लिए कम-से-कम में इंसान ढूँढने पड़ेंगे। चूँकि व्यापार के कई स्तरों जैसे की खुदरा व्यापार, फुटकर व्यापार, निर्यात और मालवाही के साधनों पर, कुछ जातियों के हिन्दुओं, ऊँची जाति के सरदारों, जैनियों, पारसियों और ऊँचें मुसलामानों का ज्यादा कब्जा है, जिसकी वजह से उसे भी उन्ही के जैसा शोषक बनाना पड़ेगा जैसे कि वह सब हैं। तब ही उसे कुछ मुनाफा होगा और वह आगे व्यापार कर पाएगा। दलितों में भी कुछ लोग शोषक वर्ग का हिस्सा बन जाते हैं पर तब भी हिन्दू धर्म की क्रूरता उनका साथ नहीं छोड़ती। आदमी तो आपनी जात बदल नहीं सकता औरतों के लिए यह आसान है कि वह किसी हिन्दू से शादी कर ले जो कि ऊंची जाति का है जिससे कि वह लुप्त हो जाए। जैसे शारीरिक बलात्कार की शिकार महिला समाज में अपना मुँह दिखाने से घबराती है चूँकि समाज उससे भी बड़ा दरिंदा है जिसने कि उसके सम्मान को ठेस पहुंचाई है। ठीक उसी तरह दलितों की लड़कियाँ भी जातिवाद के बलात्कार रुपी अपमान से बचने के लिए किसी दलित आदिवासी की जगह हिन्दू को चुनती है जिससे कि समाज में उनका और जाति ग्रस्त बलात्कार न हो। यह ऐसा है जैसे कोई गुलाम अपने आका की गुलामी से छूटने की जगह, अपने और गुलाम भाइयों को छुड़ाने की जगह, सदा के लिए उसकी गुलामी स्वीकार कर ले। इससे ज्यादा अपमान क्या कुछ और हो सकता है ? न दलितों की ज़मीन है, न औरत। कोई उनको खाए जा रहा है जिसका उनको पता नहीं है। उनके काम बंद कर दिए जाते हैं, मौहल्ले उजाड़ दिए जाते हैं, उन पर शोषण करने वालों का वह धर्म सनातन बना कर लाद दिया जाता है जिसमें उसकी गुलामी छिपी है और दलित बैल की तरह यह सब लादता है। नौ सौ चोहत्तर अब नहीं चलती। मादी पुर का बस अड्डा भी अब नहीं है। अब उस बस स्टैंड का इलाका एक प्रमुख व्यापारी केंद्र बन गया है जहाँ सड़कों पर दलित, आदिवासी और पिछड़े समाज के लोग मांस, सब्जी और फल बेचते हैं और हिन्दू ज्यादातर दुकाने खोले बैठे हैं। पहले दुकाने भी ज्यादातर दलितों में भंगी, चमार, रैगर, खटीक और अछूत सिंधियों आदि की थी पर देव नगर के उन पड़ोस वाले चमारों की तरह वह भी उन्होंने किसी खत्री या बनिए के हाथों गंवा दी थी। जो नहीं गंवा पाए वह आज भी दुकान चला रहे हैं। मादी पुर के बस स्टैंड के पीछे सब्जी की मंडी थी। दो-चार रेड़ी वाले केले सेब आदि फल बेचा करते थे। रैगरों, चमारों, बलियों अदि की कुछ औरतें सड़क पर अदरक, मिर्ची, लहसुन आदि बेचा करती थी। बस स्टेण्ड और उसके आस पास का इलाका खुल्ला-खुल्ला था। मम्मी और मैं स्टैंड पर आते। नौ सौ सतरह की दूसरी तरफ डी टी सी का एक छोटा सा कमरा था जिसमें कि चालक और कंडक्टर आराम के लिए बैठा करते थे। मम्मी कहती जा कर अंकल से पता कर के आओ कि बस कितने बजे चलेगी। रोड़ मुझे काफी बड़ा लगता था पर, फिर भी मैं डर को काबू में कर के उस पार जाता और पता करके आ जाता। हम दो तरह की बसों में बैठ कर जाया करते थे। एक जिसमें दोनों आदमी और औरत सफ़र किया करते थे और दूसरी जिसमें केवल औरतें ही सफ़र किया करती थी। पहली बस में तो इंसान ठूंस-ठूंस कर लाद दिए जाते थे। पर दूसरी में थोड़ा खालीपन होता था जो कि ठीक लगता था। भरी बस में ज्यादातर आदमी तैयार हो कर जाते थे जो कि ज्यादातर महीनावर नौकरियों में थे और वह भी शायद सरकारी नौकरियों में। इनमें दलित जातियों से बहुत कम होते थे। अधिकतर पंजाब से आए खत्री, भारत के दूसरे राज्यों के पढ़े लिखे ब्रहामण और कुछ जाट, गूजार और यादव अहीर ज्यादा होते थे। ये दिखने में दलितों से अलग थे। थोड़े ज्यादा लम्बे, रंग में सफेदी लिए, पैने नैन नक्शों वाले। ये ज्यादा चतुर थे। यह दलितों की तरह आपस में ज्यादा बातें नहीं करते थे। ज्यादा बहस भी नहीं करते थे। ज्यादातर चुप रहते थे। मानो कि इन्हें सब पता हो। दूसरी बस में ज्यादातर दलित महिलाऐं होती थीं जो कि ज्यादातर रैगर और चमार थी। वह ज्यादातर अपनी पारंपरिक वेशभूषा पहनती थी। कोई भी सलवार कमीज नहीं पहनती थी। कई तो चाँदी के मोटे मोटे आभूषण पहना करती थी जो कि उनके लिए कीमत से ज्यादा श्रृंगार का प्रतीत था। उनमें अधिकतर प्रौढ़ होती थी और कुछ मध्यम उम्र की। कोई जवाव या कुवांरी नहीं होती थी। प्रौढ़ महिलाओं में से ज्यादातर विधवाएँ थी या वह जिन्हें अपनी स्वतंत्र कमाई ने आर्थिक मजबूत कर दिया था। मध्यम उम्र वाली तो शायद सब विधवाएं ही थी। मेरी माँ भी एक विधवा थी। वह औरतें मोती नगर में प्लास्टिक फैक्ट्रियों में चप्पल की कटाई आदि करने जाती, कुछ चक्की पर अनाज बीनने, कुछ रुई के गद्दों की सिलाई करने और मेरी माँ अकेली सरकारी क्लर्क की नौकरी करने जो कि मेरे पिता की म्रत्यु पर उसे मिली। हिन्दू धर्म विधवा से जीने का हक़ छीन लेता है। अगर वह ज़िंदा रह जाती है तो उसके शरीर से खेलने के लिए तो सारे हिन्दू मर्द बन जाते हैं पर उसे सम्मान का जीवन देने या उसके बच्चों को बाप का प्यार देने में उनकी मर्दानगी ख़त्म हो जाती है। दलित भी अब इन नामर्द हिन्दुओं की कुप्रथाओं को अपनाने लगे थे। अब दलितों के मर्दों ने अपनी विधवा बेसहारा औरतों को और अपने ही समाज के अनाथ बच्चों को सहारा, प्यार और बाप का साया देने की बजाय किसी बनिए, खत्री, जैनी, सरदार या तेली की फैक्ट्रियां और दुकाने चलाने के लिए छोड़ दिया। पर वह औरतें खूब हंसती, आपस में खूब बातें करती और सबसे ज्यादा मजा तो यह देख कर आता कि वह अपनी राजस्थानी या ब्रज की भाषा में लोक गीत गाती, तालियाँ बजाती और कुछ तो चलती बस में नाचने भी लगती। बस के ड्राईवर और कंडक्टर जो कि अधिकतर जाट होते थे, उन्हें भी इस मानवीय सभ्यता की उस संस्कृति का आभास होता जिसमें नृत्य है, संगीत और गाने हैं और एक मनुष्यता की भावना है। पर यह संस्कृति उस बस में अपनी आखरी साँसे ले रही थी। जब स्टैंड आता तो उन औरतों के चेहरे से ख़ुशी उतर जाती। तब उन्हें यह एहसास हो जाता कि उन्हें अब उस काले सपने में प्रवेश करना है जो कि किसी काले कुँए की तरह उन्हें खा रहा है। उतरते समय वह सब एक दम ग़मगीन हो जाती। गाने नाचने वाली वह महिलाएँ अचानक किसी निर्जीव सी वस्तु की तरह पंक्ति बना कर बस के बहार खुद को धकेल देती। तब ड्राइवर और कंडक्टर के चेहरे भी बदल जाते। वह किस्सी जल्लाद के जैसे बेरुखे हो जाते। उनका काम खत्म हो चुका था। वे गुलामों को कारखानों, दुकानों तक लाद चुके थे। गुलामों को धकेलने की किसी और को जरुरत नहीं पड़ी। गरीबी और सामाजिक चेतना की कमी गुलाम को काबू में करने के लिए काफी थी। डॉ. भीमराव आंबेडकर जी ने जातिवाद के अपने लेख में लिखा है कि हिन्दू विधवा को जलाते थे जिससे कि नर और मादाओं का अनुपात पूरा रहे और ज्यादा मुँह नहीं भरने पड़े। दलित अब हिन्दू बनते जा रहे थे। वे विधवाओं को जला तो नहीं पाते थे पर सड़ देने के लिए छोड़ रहे थे।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

यह ब्लॉग खोजें

For Donations

यदि डॉ भीमराव आंबेडकर के विचारों को प्रसारित करने का हमारा यह कार्य आपको प्रशंसनीय लगता है तो आप हमें कुछ दान दे कर ऐसे कार्यों को आगे बढ़ाने में हमारी सहायता कर सकते हैं। दान आप नीचे दिए बैंक खाते में जमा करा कर हमें भेज सकते हैं। भेजने से पहले फोन करके सूचित कर दें।

Deposit all your donations to

State Bank of India (SBI) ACCOUNT: 10344174766,

TYPE: SAVING,
HOLDER: NIKHIL SABLANIA

Branch code: 1275,

IFSC Code: SBIN0001275,

Branch: PADAM SINGH ROAD,

Delhi-110005.

For inquiries call: 8527533051 sablanian@gmail.com