Printed T-shirt of Dr. Ambedkar Call 8851188170, 8527533051

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Dr Ambedkar aur Bauddh Dhamm par pustak call 8851188170, 8527533051

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Dr. Ambedkar ji ki sankshipt jivani aur unke sandeshon par pustak call M. 8527533051, 8851188170

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Dr. Ambedkar ji Ki Prachar Samgri List-1

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Dr. Ambedkar, Bhagwan Buddha aur Guru Ravidas ji ji Ki Prachar Samgri List-2

Dr. Ambedkar, Bhagwan Buddha aur Guru Ravidas ji ji Ki Prachar Samgri List-2

List-3 Dr. Ambedkar, Bhagwan Buddha aur Guru Ravidas ji ji Ki Prachar Samgri

List-3 Dr. Ambedkar, Bhagwan Buddha aur Guru Ravidas ji ji Ki Prachar Samgri

List-4 Dr. Ambedkar, Bhagwan Buddha aur Guru Ravidas ji ji Ki Prachar Samgri

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List-5 Dr. Ambedkar, Bhagwan Buddha aur Guru Ravidas ji ji Ki Prachar Samgri

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Hindi Books of Dr. Ambedkar

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Polo T-shirt, Printed, Coloured, of Dr. Ambedkar and Coustamized

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सोमवार, 3 सितंबर 2012

भाग तीन : "सूनी गलियाँ"

मादी पुर से देव नगर की बस नौ सौ सतरह से मैं और मम्मी रचना सिनेमा से आगे आने वाले राधा स्वामी सत्संग के बाग़ के बहार उतर जाते थे। यह वही रचना सिनेमा है जो कि पटेल नगर के पास प्रसाद नगर में स्थित है। पास ही में राजेन्द्र नगर है। प्रसाद नगर किस के नाम पर पड़ा यह तो पता नहीं पर पटेल नगर नाम शायद वल्लभ पटेल के नाम पर रखा गया था और राजेन्द्र नगर राजेन्द्र प्रसाद के नाम पर। प्रसाद नगर, पटेल और राजेन्द्र नगर के बीच में आता है, और देव नगर से सटा हुआ है। प्रसाद नगर में ही दलितों, पिछड़ो को सेंतालिस के बाद ब्रहामणों की इंदिरा गाँधी वाली काँग्रेस सरकार ने अपना प्रसाद दिया। जहाँ अंग्रेजों ने डेढ़ सौ से पिचहत्तर गज के दो तरफ खुल्ले मकानों से देव नगर बसाया था, उसी के बाजू में दलितों को उजाड़ कर हिन्दुओं ने होटल, सिनेमा घर और अपने आफिस की ऊँची इमारते बनवाई। और दलितों के खाते में आई मादी पुर की तंग बस्ती जिसमें पचीस या शायद बाईस गज के छोटे-छोटे मकान ठूँसे गए। यह कुदरत के बेरुखी ही कहिए कि इन नई इमारतों में से एक में बनाने के कुछ सालों बाद आग लग गई और वह दशकों तक बंद पड़ी रही। यह सिनेमा घर भी पिच्च्ले एक दशक से बंद पड़ा है। इंसान को उजाड़ कर पूंजी को उगाने की कोशिश की गई। अब बस इमारत है। कितने इंसान इन इमारतों के लिए ख़त्म किए गए, अगर इसका हिसाब यह पूंजीपति हिन्दू, सिख और जैनी लगाते तो सोचते कि पूंजी से उन्हें क्या मिला, बस थोड़ा आराम। पर इतने मासूमों को बेघर कर के उनकी जिन्दगी उजाड़ कर आराम की जिन्दगी जीना क्या इंसानियत है ? शायद इंसानियत की बोली वह भूल चुके हैं। नहीं तो वह ऐसा नहीं करते। कोई भी विकास लोगों को उजाड़ कर उन्हें खत्म करके नहीं किया जाता। अगर कल को दलित, आदिवासी और पिछड़ा वर्ग भी इसी राह पर चल पड़ेगा तो महा विनाश की स्थिति आ जाएगी। डॉ. आंबेडकर जी ने बौद्ध धम्म का रास्ता अपना कर शायद इस महाविनाश को रोक दिया। बौद्ध धम्म दया और शांति का धम्म माना जाता है। आज जब एक दलित, आदिवासी या कोई पिछड़ा अपने अतीत को खोजता हुआ डॉ. आंबेडकर तक पहुंचता है तो उसे बौद्ध धम्म का मार्ग नज़र आता है, जिससे कि वह सामाजिक आघातों से तड़पता शांत हो जाता है। पर शोषक हिन्दू जो कि अब पूंजीपति बन गया है और बाकी समाज भी अब समाज न रह कर पूंजी का गुलाम बन गया है ऐसे समाज में अब दर्द की भावना इस सपने से खत्म हो जाती है कि वह भी एक दिन हिन्दुओं के समान पूंजीपति बनेगा। पर पूंजी विकास का लक्ष्य नहीं हो सकती। पूंजी से समाज उठता नहीं टूट जाता है। पूंजी और पूंजी का सपना समाज को सिर्फ और सिर्फ मूर्ख बनाने का एक खेल है। असली खेल सामाजिक चेतना को दबाने का है जो पूंजीपति जानता  है, इसीलिए देर सबेर छुट-पुट तरीके से सामाजिक चेतना को पैदा नहीं होने देता। और इंसान सिर्फ इस पूंजीपति का खिलैना मात्र बन कर रह गया है। जब उसका मन करता है तब उतनी पूँजी रूपी चाबी भर देता है और अपनी मर्जी से उस खिलौने को चलाए रखता है जब तक कि उसे जरूरत होती है। जब खिलौना खुद चले लायक बन जाता है तो या तो उसे ख़त्म करने के नए-नए तरीके इजाद किए जाते हैं या फिर उसे छोड़ दिया जाता है। दलितों को भी शहर बसाने तक चाबी भर-भर के रखा जाता है, आदिवासियों को तो फेंक दिया जाता है या थोड़ी चाबी दे कर चालू रखा जाता है, शूद्रों या कहे कि पिछड़ा समाज तो इस चाबी का गुलाम बन चुका है। उसे अब इसकी परवाह नहीं है कि दूसरे में कितनी चाबी भरी जाती है। उसे इतने सालों में खूब चाबी मिली है कि उसे इसकी आदत पड़ गई है और उसे अगर यह नहीं मिलती तो वह तिलमिलाने लगता है। चाबी चूंकि हिन्दू कहे जाने वाले उच्च समाज के पास है तो वह उसकी चाबी के लिए कुछ भी कर देने को तैयार हो जाता है, पर अपने आकाओं को एक सीमा तक ही रुष्ट करता है क्योंकि उसे चाबी की खुराब जो चाइए। दलित को यह खुराक नहीं मिली। अगर मिलती तो इसका असर सारे भारत पर पड़ता। आज भारत में दुनिया के सबसे ज्यादा गरीब और शायद किसी भी देश के मुकाबले सबसे ज्यादा अमीर लोग हैं। इस आर्थिक खाई का कारण है हिन्दुओं की सोची समझी साजिश जिसके कारण कि आज यह देश टूटता बिखरता नज़र आता है। मुसलामानों को वह पसंद नहीं करते पर उनसे डरते भी हैं। सिखों को बेशक वह चुप करा सके हैं पर अब ऐसा नहीं कर सकते। बाकी उनके या वे दूसरों के किसी न किसी रूप में भागीदारी हैं। दलितों ने भी इसमें एक गुपचुप भागीदारी कर ली है कि अगर थोड़ी-थोड़ी चाबी उन्हें भी मिलती रहे तो वह गाँधी के गूंगे, बहरे और अंधे और राम के सेवक बन्दर हनुमान बने रहेंगे और समुद्र मंथन से निकली उनकी शराब के साथ ऐसे चिपके रहेंगे जैसे पतंगा लौ से। दलित अक्सर पढ़ लिख कर नौकर बन भी जाता है तो नौकर ही रहता है। वह हिन्दू धर्म के वर्ण आश्रम का ऐसे पालन करता है जैसे बैल, हांकने वाले का। वह यह नहीं देखता कि उसे जो ज़रा सी चाबी की खुराक मिली है उसे दिलाने वाले डॉ. आंबेडकर जी कई वर्षों तक अध्यन्न करते रहे और सारा जीवन लेखन और शोध में लगा दिया जिससे कि समाज सुधर सके। दलित तो अपने बीवी बच्चे से आगे समाज जानता ही नहीं है। ज्यादा-से-ज्यादा वह अपनी जाति तक ही बंधा रहता है। आजकल के पढ़े लिखे दलित युवक युवतियों को तो जरा सा कालेज में दाखिला मिलने पर ही अपने समाज से ज्यादा अपने शोषणकर्ता हिन्दू, सिखों या कोई दूसरा समाज पसन्द आने लगता है। अपनी जाति या दूसरी दलित जाति से वह ऐसे कन्नी काटने लगते हैं जैसे उनकी जाति या और दलित समाज कोई साँपों की बाम्बी हो। पर ऐसे झूठे जीवन से उन्हें कितना संतोष मिलता है इसका संदेह होता है। इंसान आखिर एक सामाजिक प्राणी है और जब उसे पता है कि जिस समाज में उसे उठना बैठना या सारा जीवन बिताना पड़ रहा है, जिसने उसके पुरखों को हजारों सालों तक न सिर्फ यातनाएं दे कर प्रताड़ित किया बल्कि आज भी चैन से जीने नहीं दे रहा, तो अपमान का घूँट तो अवश्य ही पीना होता होगा और तब वह किसी शिव की भाँती विष का घूँट पी कर चुप हो जाते होंगे। पर मुझे बचपन में बड़ा अपमानित महसूस होता था जब मैं बस में से उस प्रसाद नगर वाले राधा स्वामी सत्संग के विशाल पार्क को देखता था। हजारों दलितों को उसी के पास से उजाड़ा गया था पर वह वहीं का वहीं था। बाद में पता चला कि बहुत से दलित उनके नौकर बन चुके थे। कुछ औरतें खुश थी कि उनके मर्दों ने राधा स्वामी बन कर शराब छोड़ दी पर वह यह नहीं जानती थी कि अमीर हिन्दू, सिख, पारसी, इसाई और मुसलमान हजारों रूपये की शराब एक रात में गटक कर भी गरीब नहीं बनता और गरीब बीस रूपये की शराब छोड़ कर अमीर नहीं बनता। अमीरी-गरीबी कोई नसीब नहीं बल्कि चंद चालाक लोगों का एक खेल है। जिसके सर पर पैसे का भूत सवार हो जाता है, वह इंसान को और समाज को न देख कर व्यसनों से जीवन बर्बाद करने लगता है और उसका शौक पूरा करते हैं नेता जो निजी स्वार्थों की खातिर बिक जाते हैं। दलितों में इतना दम था ही कहाँ जो कि यह आवाज उठा पाते कि जब धर्म के और व्यवसाय के नाम पर ऊँची जाति के कहे जाने वाले हिन्दुओं और सिखों को तो बसाया जाता है, तो उन्हें क्यों उजाड़ा जाता है। और अगर ऐसा करते भी तो दिल्ली पुलिस के वह जाट, गूजर या यादव आक्रमणकारी किसी भूखे दरिंदों के समान छोड़ दिए जाते जो कि वैसे तो ब्रहामणों के लालच में आ कर मांस खाना छोड़ चुके थे पर दलित का मांस उन्हें अति प्रिय लगता था। यह वही हैं जो कि आज खुद को पिछड़ा समाज बता रहे हैं और आरक्षण की गुहार लगा रहे हैं। पर सच तो यह है कि यह बहार से आए वह आक्रमणकारी रहे हैं जिन्होंने देर सबेर हिन्दुओं से संधि की और राज किया। इनकी नजर में दलित और आदिवासी वैसा ही है जैसा कि हिन्दू की नजर में। दलितों को तो इस देश और यहाँ के मूल धर्म में भाग्य लिखा हुआ है कि वह पिटते रहेंगे और यही इन जतियों के लोगों ने किया जिनकी मात्रा दिल्ली पुलिस में आज भी अत्याधिक है। बेसहारा और कमजोर दलित और क्या करता ? वह तो खुद को ही कोसते रहे और रहते हैं। अगर किसी शेर को पिंजरे में कैद कर दिया जाए तो वह भी बकरी जैसा दबा हुआ हो जाता है। इसी प्रकार दलितों को भी जे जे (झुग्गी- झोपड़ी) कलोनी नामक पिंजरों में बसाया गया जहाँ कि इनकी आवाज दब कर रह जाए और यह न ही तो पनप सके और न ही हिन्दुओं के खिलाफ कोई बगावत कर सके। अनपढ़, गरीब, धार्मिक रूप से दुत्कारे गए और कमजोर आदमी। हजारों सालों से गुलाम बने रहने के कारण इनके कद भी छोटे रह गए हैं, नहीं तो कई गर्म प्रदेशों में भी लोग लम्बे होते हैं। इनके शारीर की बनावट किसी हिन्दू, ऊँची जाति के, या या जट सिख, अदि से कमजोर है। क्योंकि इन्हें पनपने नहीं दिया गया। जहाँ एक तरफ बौद्धिक तौर पर हिन्दू प्राइवेट स्कूलों और ईसाई स्कूलों में अपने बच्चों को पढ़ाने लगे पर दलितों में हजारों में से एक या दो ही ऐसे थे या हैं जो कि प्राइवेट स्कूलों में बच्चों को पढ़ा पाते और ईसाई स्कूलों में तो शायद कोई नहीं। मेरी माँ मुझे राधा स्वामी सत्संग के बस अडडे से पैदल ही चना मार्किट वाले स्कूल में ले जाया करती। रास्ते में बहुत बड़े-बड़े और दिखने में खूबसुरत और आलीशान मकान पड़ते जो कि सेंतालिस के बाद हिन्दुओं के बने थे। वापसी में नानी ज्यादातर स्कूल से लेने मादी पुर से चना मार्किट आया करती। वह कभी अपने बूढ़े बाप को देखने रैगर पुरा जाया करती, तो कभी अपनी बहन रुकमा से मिलने संत नगर सौ क्वाटर। रास्ते में रैगरों और चमारों के देव नगर और रैगर पुरा के घर पड़ते। यह घर सूनी सी पड़ी रहने वाली गलियों में थे। अधिकान्शतर रैगर, चमार, भंगी, खटीक, सांसी, सिन्धी, आदि के प्रसाद नगर में रहने वाले रिश्तेदार अब वहाँ से जा चुके थे। हिन्दुओं ने दलितों की छावनी तितर बितर कर दी थी। टैंक रोड़, बापा नगर और आनंद पर्वत में छावनियाँ बसने ही नहीं दी। दलितों का जनसंख्या घटत्व कम करके उन्हें और कमजोर कर दिया गया। नई बस्तियाँ उतनी दूरी पर बसाई गई कि दलित जातियों में विद्रोह की स्थिति में वे सब एकत्र नहीं हो पाए। बीच में हिन्दुओं ने अपनी विशाल छावनियां बसाई जैसे पटेल नगर से मादी पुर लगभग दस किलोमीटर की दूरी पर दलितों को बसाया गया और फिर नांगलोई, मंगोल पुरी, ज्वाला पुरी, सुलतान पुरी आदि। शायद ही कोई दलित काँग्रेस की ब्रहमणी इंदिरा गाँधी के इस दिमाग को समझ पाया होगा। कुछ साल पहले बीजेपी के जगमोहन ने भी ऐसा ही किया। हिन्दू उससे बहुत खुश हुए कि उसने अछूतों और पिछड़ो को दिल्ली के कई कोनों से निकाल कर दूर फेंका। ज्यादा खुशी उन्हें इस बात की हुई कि अब वोटिंग में यह दबे कुचले लोग अपना जन समर्थन नहीं दे पाएँगे। अर्थात प्रजातंत्र भी रहेगा और वैसा जैसा कि खुद को ऊँची जाति का माने जाने वाला हिन्दू चाहेगा। दलितों की छावनी सूनी पड़ती जा रही थी और दूसरी तरफ उनके लिए बसाए जेलों नुमा बस्तियों में उनकी जनसंख्या के साथ-साथ उनकी शारीरिक, आर्थिक और मानसिक शक्ति भी घटने लगी। देव नगर में कोई घर राजस्थान की किसी हवेली की नक़ल होता तो कोई नए जमाने के डिज़ाईन में। पर यह घर हिन्दुओं के घरों जैसे आलिशान न थे। नानी के बाप का मकान बस दिखने का बड़ा था। उनका बाप एक कोठरी में पड़ा था और बेटा बहु और उनके बच्चे ऊपर दो कमरों में। बाकी सारा मकान किराये पर था। और उनकी बहन का मकान तो शुक्र है कि दीवारों पर खड़ा था। पर मेरे दिमाग में अभी तक भी मेरे उस नए घर की छाप नहीं पड़ी थी। पड़ती भी कैसे जब उसमें इतनी जगह ही नहीं थी कि वह मेरी उन समृतियों को तोड़ कर अपनी जगह बना पाती जहाँ पहले वाले घर और हिन्दुओं के बड़े-बड़े घरों की जगह बनी हुई थी।

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