Printed T-shirt of Dr. Ambedkar Call 8851188170, 8527533051

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Dr Ambedkar aur Bauddh Dhamm par pustak call 8851188170, 8527533051

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Dr. Ambedkar ji ki sankshipt jivani aur unke sandeshon par pustak call M. 8527533051, 8851188170

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Dr. Ambedkar ji Ki Prachar Samgri List-1

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Dr. Ambedkar, Bhagwan Buddha aur Guru Ravidas ji ji Ki Prachar Samgri List-2

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List-3 Dr. Ambedkar, Bhagwan Buddha aur Guru Ravidas ji ji Ki Prachar Samgri

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List-4 Dr. Ambedkar, Bhagwan Buddha aur Guru Ravidas ji ji Ki Prachar Samgri

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Polo T-shirt, Printed, Coloured, of Dr. Ambedkar and Coustamized

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शनिवार, 15 सितंबर 2012

भाग चार : बी ब्लाक पार्क नंबर दो

उस नई जगह पर मादी पुर के डी टी सी बस स्टैंड के अलावा जिस दूसरी जगह की स्मृति मेरे दिमाग में उभरती है वह है मादी पुर बी ब्लाक का पार्क (पारक) नंबर दो। पार्क का नंबर या ब्लाक मेरे दिमाग की पिछली स्मृतियों में नहीं है, यह तो मैंने मात्र इस अध्याय का नाम दिया है। मेरी स्मृतियों में तो छुपा है वह बड़ा और हरा भरा पार्क। जो तंग गलियाँ और छोटे मकान एक बच्चे की स्मृतियों का हिस्सा भी नहीं बन सकते थे उन्हें हज़ारों दलित परिवारों का जेल बना दिया था। ऐसा नहीं था कि दिल्ली में कोई जगह की कमी थी। पर दलितों के लिए हिन्दु धर्म और उस पर पालन करनेवाली काँग्रेस और उसे चलने वाले ब्राह्मणों के पास दलितों अर्थात अछूतों के लिए जगह नहीं थी। दिल्ली बसती चली गई पर दलित मादी पुर और उसी के जैसी बसाई कलोनियों में घुटते चले गए। जो परिवार कभी हँसते खेलते थे वह तंग मकानों और छोटी-छोटी गलियों में अपना दम तोड़ने लगा। यह बस्तियाँ  दलितों के लिए एक और अपमान का घूँट बन गई। एक तो उस पर हिंदु धर्म की थोपी हुई नीचि जाति की छाप और अब वह बन गया जे जे (झुग्गी-झोपड़ियों) में रहने वाला। उसकी कोई इज्जत नहीं, इज्जत का हक़ कैसे मिलेगा जो कि हिन्दु धर्म में उसके लिए है ही नहीं। अछूत कैसे शहरों में अच्छे मकानों में रह सकते हैं। हिंदुओं को तो दलित के तन पर अच्छा कपड़ा तक भी इतना नापसंद है कि वह भी उसकी अंखों में खटकता है फिर उसे थोड़े बड़े घर और सम्मान जनक जीवन कैसे जीने देंगे। जैसे गिद्ध माँस की बोंटियों को नोचने के लिए झपटता है वैसे ही हिंदु दलित और आदिवासियों पर झपट्टा है क्योंकि यह उसका धर्म है। जिस तरह से हिन्दुओं ने दलित और आदिवासियों पर आज भी अपना प्रहार जारी रखा है, इन्हें सभ्य इंसान की श्रेणी में नहीं बल्कि एक फौजी की श्रेणी में रखना चाहिए। चूँकि सेना में इनकी तादाद ज्यादा है और पुलिस से भी इन्हीं का गुंडा राज चल रहा है जो कि दलित और आदिवासियों के दमनकारियों का संरक्षण करता है सो हिन्दुओं (ब्रह्माण, क्षत्रिय और वैश्य) एक फ़ौज है जो कि अपने दुश्मन का निरंतर दमन कर रही है। दमन की यह गाथा इतिहास में सबसे लम्बी है और रुकने का नाम ही नहीं ले रही। बस इसके रूप बदल जाते हैं और यह चलती ही चली जा रही है और मानव इतिहास को कलंकित किये जा रही है। इंसान के जीवन से अगर उसका आत्म सम्मान ही छीन लो तो फिर क्या बच जाता है। जे जे कलोनियाँ दलितों के जिम्मे ही क्यों आई ? ऐसी कलोनियाँ खत्री, ऊँची जाति के सिखों, जैनियों आदि के लिए भी बसाते अगर समानता लानी थी ? और यह अछूत दलित कहीं मर न जाए जिससे कि हमारे ऐशों आराम न ख़त्म हो जाए और हमें इन्ही की तरह कहीं मेहनत भरा जीवन न जीना पड़ जाए, इसका ख्याल हिंदु, ऊँची जाति का सिख, अगड़ा मुसलमान और जैनी खूब रखता है। इसीलिए हिन्दुओं ने बड़े-बड़े पार्क बनाए कि कहीं हम दड़बों में घुट-घुट कर मर न जाएं। बहुत से तो अकस्मात मर चुके हैं। न सम्मान भरा जीवन और न ही जीवन जीने के साधन। यह सब षड्यंत्र डॉ. भीमराव आंबेडकर जी के महापरिनिर्वाण के एक दशक बाद शुरू हुआ। अब हिन्दुओं को डॉ. आंबेडकर का डर नहीं था। न ही अंग्रेज थे जो कि बराबरी की बात करते। अब यह अपनी औकात पर आ चुके थे और किसी वहशी दरिंदे कि तरह पिंजरे से आज़ाद हो कर खुल्लम-खुल्ला अपनी मनमानी कर रहे थे। जिस दिल्ली को दलितों और आदिवासियों ने अपने हाथों से बनाया था अब उस पर इनका कब्ज़ा था। ज्यों-ज्यों इनका कब्ज़ा बढ़ता गया दलित और मुसलमान सिकुड़ता गया और यह फैलते ही जा रहे हैं। जहाँ दलितों के लिए इन्होने झुग्गी बस्तियाँ बसाई उन्ही के बाजू में यह बड़े-बड़े आलिशान बंगलों या फार्म हाउसों में पसरे हुए हैं या अपनी फैक्ट्रियाँ और दुकाने चला रहे हैं। नौकरों की खपत दलित, आदिवासी यो कोई पिछड़े समाज का कर देता है। यह है नेहरु का समाजवाद और गाँधी का राम राज। आंबेडकर राज चला गया था वरना ऐसा नहीं होता। बड़ा पार्क और छोटे-छोटे मकान और तंग गलियाँ ?

           पार्क में सुबह से ले कर शाम तक भीड़ लगी रहती। रात में कई लोग उसमें सोते। मेरे नान जी भी कई सालों तक पार्क में ही सोते रहे। यहाँ तक कि सर्दियों में भी। बच्चपन में सोचता था कि नाना जी को पार्क अच्छा लगता है पर सच तो यह था कि घर में जगह नहीं थी। मैं सुबह-सुबह पार्क में उनके पास जाया करता था। मेरी तरह पार्क और दलितों को भी बहुत पसंद था। बच्चे सर्दी की छुट्टियों में सारा दिन पार्क में खेलते। गर्मियों में सुबह और शाम बच्चों और युवकों का भी पार्क में तांता लगा रहता। एक तो घर में जगह नहीं दूसरे काम धंधा नहीं और न ही तो सरकारी स्कूल जिनमें कि ज्यादातर शिक्षक हिंदु होते थे वह दलितों को पढ़ाने में रुचि कहाँ से लेते, घर पर कोई पढाने वाला था नहीं, चमड़े का काम न सिर्फ दिल्ली बल्कि उत्तर भारत के कई स्थानों से ख़त्म कर दिया गया था। पार्क में खाली बैठे ताश खेलते जिंदगी बिताना वैसे ही है जैसे कोई जेल में ताश खेल रहा हो और अपना समय पूरा कर रहा हो। कुछ आदमी जो कि चप्पल जूते बनाने का काम करते उन्हें साल में कुछ दिन ही काम मिल पाता पर दलित इस काम में भी मजदूर बनाए रखे गए हैं। सेंतालिस के बाद उन्हें वह साधन नहीं मिले जो कि ब्रिटिश साम्राज्य और डॉ. आंबेडकर जी के समय में मिले थे।

           पार्क के चारों तरफ सफेदे के पेड़ होते। कुछ जलेबों (शहतूत) के भी। पहले शादी ब्याह सादगी के साथ गलियों में होते थे पर धीरे-धीरे हिन्दुओं की देखा-देखी दलितों ने भी दिखावा सीख लिया और फिर शादी ब्याह पार्कों में बड़े से बड़े दिखावे के साथ होने लग गए। यहाँ तक कि नब्बे के दशक की शुरुआत में जब एक चमार कारखानेदार ने एक लड़के की पैदाईश पर पार्क में टैंट लगा कर शादियों जैसा खड़ा खाना किया तो लोगों में संशय पैदा हो गया और कुछ एक ने दबे मुँह इसकी भर्त्सना भी की क्योंकि अधिकांश्तर अति निम्न्न स्थिति में थे और जैसे तैसे करके ज़िंदा थे और ऐसे बदलते सामाजिक माहौल में इतना खर्चा करना सबके बस की बात नहीं थी। कई दलित कारखानेदारों ने काम में पैसा बनाया पर दलित कारीगर उनके यहाँ भी कारीगर भर बन कर रह गए। जो कारखानेदारों ने भेदभाव न कर के बराबरी रखी वह पनप नहीं पाए क्योंकि व्यपार पूंजी का खेल है और जो जितना मजदूर की कमाई घटाता है वह उतनी ही बचत करता है। इसीलिए बहुत से दलितों ने जूते चप्पल बनाने की कारीगरी छोड़ कर कहीं और मजदूरी शुरू कर ली। जो कहीं नहीं लग पाए या दूसरी समाजिक स्थिति में नहीं ढल पाए वह पार्क में ताश खेलते रहते। कई बार तो अमीर बनाने के लालच में जुआं भी चलता और फिर जिन हिन्दुओं की काँग्रेस सरकार ने गरीबी और अपमान भरा जीवन दिया था उन्हीं के छोड़े जाट, गूजर या यादव पुलिस वाले आकर जुआं खेलने वालों को मारते-पिटते और पार्क के चारों तरफ आतंक छा जाता। जिन बिचारे दलितों का पहले से ही सम्मान खत्म कर दिया गया था अब उन्हें और भी अपमानित किया जाता, जैसे अपमानित होना दलितों का धर्म हो और उन्हें अपमानित करना हिन्दुओं का धर्म। पुलिसवाले गन्दी-गन्दी गलियाँ देते, आदमियों को मुर्गा बनाते, उनके बाल नोचते, सरेआम पिटाई करते और फिर रिशवत मांगते। जो दे देता उसे छोड़ देते और जो सौ पचास नहीं दे पाता उसे चौकी में ले जा कर खूब पीटते। कुछ इस से बगावत कर बैठे और नशे के आदि हो गए या चोरी डकैती करने लगे। पर फिर भी ऐसों की संख्या छुटपुट ही थी। चूंकि बगावत अभी तक भी दलितों ने सीखी नहीं थी और अगर कोई गरम खून बगावत करता तो उसका साथ देने वाला कोई नहीं होता। जिसे अपराध कहते हैं मैंने तो उसकी शुरुआत ज़ुर्म से बगावत के रूप में शुरू होते देखी है। पर दुश्मन की सेना का दलित कहां से सामना कर पाते। बागी की बगावत बढ़ती ही जाती और या तो वह नशे का आदि हो कर जेलनुमा बस्तियों में मर जाता या एक जेल से दुसरे जेल अपराधी बना कर भेज दिया जाता। इस बगावत से उसे सम्मान की अनुभूति होती होगी। पर जीवन के साधन छिन्न जाते। सम्मान और जीवन के साधन दलितों के लिए नहीं हैं। या तो दलितों को साधन मिलेंगे पर सम्मान नहीं, या सम्मान पर साधन नहीं। यही है हिन्दू धर्म जिसे नादान दलित अपना धर्म मान बैठे हैं और अब तो कई आदिवासी भी इस भ्रम के शिकार हो चुके हैं। यह बड़ा पार्क दलितों को सिर्फ एक जिंदा रहने के साधन के रूप में दिया गया जिससे हिन्दुओं को सस्ते मज़दूर मिलते रहें, पर सम्मान के लिए नहीं।

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