उस नई जगह पर
मादी पुर के डी टी सी बस स्टैंड के अलावा जिस दूसरी जगह की स्मृति मेरे दिमाग में
उभरती है वह है मादी पुर बी ब्लाक का पार्क (पारक) नंबर दो। पार्क का नंबर या
ब्लाक मेरे दिमाग की पिछली स्मृतियों में नहीं है, यह तो मैंने मात्र इस अध्याय का नाम दिया है।
मेरी स्मृतियों में तो छुपा है वह बड़ा और हरा भरा पार्क। जो तंग गलियाँ और छोटे
मकान एक बच्चे की स्मृतियों का हिस्सा भी नहीं बन सकते थे उन्हें हज़ारों दलित
परिवारों का जेल बना दिया था। ऐसा नहीं था कि दिल्ली में कोई जगह की कमी थी। पर
दलितों के लिए हिन्दु धर्म और उस पर पालन करनेवाली काँग्रेस और उसे चलने वाले
ब्राह्मणों के पास दलितों अर्थात अछूतों के लिए जगह नहीं थी। दिल्ली बसती चली गई
पर दलित मादी पुर और उसी के जैसी बसाई कलोनियों में घुटते चले गए। जो परिवार कभी
हँसते खेलते थे वह तंग मकानों और छोटी-छोटी गलियों में अपना दम तोड़ने लगा। यह
बस्तियाँ दलितों के लिए एक और अपमान का
घूँट बन गई। एक तो उस पर हिंदु धर्म की थोपी हुई नीचि जाति की छाप और अब वह बन गया
जे जे (झुग्गी-झोपड़ियों) में रहने वाला। उसकी कोई इज्जत नहीं, इज्जत का हक़
कैसे मिलेगा जो कि हिन्दु धर्म में उसके लिए है ही नहीं। अछूत कैसे शहरों में
अच्छे मकानों में रह सकते हैं। हिंदुओं को तो दलित के तन पर अच्छा कपड़ा तक भी
इतना नापसंद है कि वह भी उसकी अंखों में खटकता है फिर उसे थोड़े बड़े घर और सम्मान
जनक जीवन कैसे जीने देंगे। जैसे गिद्ध माँस की बोंटियों को नोचने के लिए झपटता है
वैसे ही हिंदु दलित और आदिवासियों पर झपट्टा है क्योंकि यह उसका धर्म है। जिस तरह
से हिन्दुओं ने दलित और आदिवासियों पर आज भी अपना प्रहार जारी रखा है, इन्हें सभ्य
इंसान की श्रेणी में नहीं बल्कि एक फौजी की श्रेणी में रखना चाहिए। चूँकि सेना में
इनकी तादाद ज्यादा है और पुलिस से भी इन्हीं का गुंडा राज चल रहा है जो कि दलित और
आदिवासियों के दमनकारियों का संरक्षण करता है सो हिन्दुओं (ब्रह्माण, क्षत्रिय और
वैश्य) एक फ़ौज है जो कि अपने दुश्मन का निरंतर दमन कर रही है। दमन की यह गाथा
इतिहास में सबसे लम्बी है और रुकने का नाम ही नहीं ले रही। बस इसके रूप बदल जाते
हैं और यह चलती ही चली जा रही है और मानव इतिहास को कलंकित किये जा रही है। इंसान
के जीवन से अगर उसका आत्म सम्मान ही छीन लो तो फिर क्या बच जाता है। जे जे कलोनियाँ
दलितों के जिम्मे ही क्यों आई ? ऐसी कलोनियाँ
खत्री, ऊँची जाति के
सिखों, जैनियों आदि के लिए
भी बसाते अगर समानता लानी थी ? और यह अछूत दलित
कहीं मर न जाए जिससे कि हमारे ऐशों आराम न ख़त्म हो जाए और हमें इन्ही की तरह कहीं
मेहनत भरा जीवन न जीना पड़ जाए, इसका ख्याल हिंदु, ऊँची जाति का सिख, अगड़ा मुसलमान और जैनी खूब रखता है। इसीलिए हिन्दुओं ने
बड़े-बड़े पार्क बनाए कि कहीं हम दड़बों में घुट-घुट कर मर न जाएं। बहुत से तो
अकस्मात मर चुके हैं। न सम्मान भरा जीवन और न ही जीवन जीने के साधन। यह सब
षड्यंत्र डॉ. भीमराव आंबेडकर जी के महापरिनिर्वाण के एक दशक
बाद शुरू हुआ। अब हिन्दुओं को डॉ. आंबेडकर का डर नहीं था। न ही अंग्रेज थे जो कि
बराबरी की बात करते। अब यह अपनी औकात पर आ चुके थे और किसी वहशी दरिंदे कि तरह
पिंजरे से आज़ाद हो कर खुल्लम-खुल्ला अपनी मनमानी कर रहे थे। जिस दिल्ली को दलितों
और आदिवासियों ने अपने हाथों से बनाया था अब उस पर इनका कब्ज़ा था। ज्यों-ज्यों इनका कब्ज़ा बढ़ता गया दलित और मुसलमान सिकुड़ता गया
और यह फैलते ही जा रहे हैं। जहाँ दलितों के लिए इन्होने झुग्गी बस्तियाँ बसाई
उन्ही के बाजू में यह बड़े-बड़े आलिशान बंगलों या फार्म हाउसों में पसरे हुए हैं
या अपनी फैक्ट्रियाँ और दुकाने चला रहे हैं। नौकरों की खपत दलित, आदिवासी यो कोई
पिछड़े समाज का कर देता है। यह है नेहरु का समाजवाद और गाँधी का राम राज। “आंबेडकर राज” चला गया था वरना
ऐसा नहीं होता। बड़ा पार्क और छोटे-छोटे मकान और तंग गलियाँ ?
पार्क में सुबह से ले कर
शाम तक भीड़ लगी रहती। रात में कई लोग उसमें सोते। मेरे नान जी भी कई सालों तक
पार्क में ही सोते रहे। यहाँ तक कि सर्दियों में भी। बच्चपन में सोचता था कि नाना
जी को पार्क अच्छा लगता है पर सच तो यह था कि घर में जगह नहीं थी। मैं सुबह-सुबह
पार्क में उनके पास जाया करता था। मेरी तरह पार्क और दलितों को भी बहुत पसंद था।
बच्चे सर्दी की छुट्टियों में सारा दिन पार्क में खेलते। गर्मियों में सुबह और शाम
बच्चों और युवकों का भी पार्क में तांता लगा रहता। एक तो घर में जगह नहीं दूसरे
काम धंधा नहीं और न ही तो सरकारी स्कूल जिनमें कि ज्यादातर शिक्षक हिंदु होते थे
वह दलितों को पढ़ाने में रुचि कहाँ से लेते, घर पर कोई पढाने वाला था नहीं, चमड़े का काम न
सिर्फ दिल्ली बल्कि उत्तर भारत के कई स्थानों से ख़त्म कर दिया गया था। पार्क में
खाली बैठे ताश खेलते जिंदगी बिताना वैसे ही है जैसे कोई जेल में ताश खेल रहा हो और
अपना समय पूरा कर रहा हो। कुछ आदमी जो कि चप्पल जूते बनाने का काम करते उन्हें साल
में कुछ दिन ही काम मिल पाता पर दलित इस काम में भी मजदूर बनाए रखे गए हैं।
सेंतालिस के बाद उन्हें वह साधन नहीं मिले जो कि ब्रिटिश साम्राज्य और डॉ. आंबेडकर जी के समय में मिले थे।
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