Printed T-shirt of Dr. Ambedkar Call 8851188170, 8527533051

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Dr Ambedkar aur Bauddh Dhamm par pustak call 8851188170, 8527533051

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Dr. Ambedkar ji ki sankshipt jivani aur unke sandeshon par pustak call M. 8527533051, 8851188170

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Dr. Ambedkar ji Ki Prachar Samgri List-1

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Dr. Ambedkar, Bhagwan Buddha aur Guru Ravidas ji ji Ki Prachar Samgri List-2

Dr. Ambedkar, Bhagwan Buddha aur Guru Ravidas ji ji Ki Prachar Samgri List-2

List-3 Dr. Ambedkar, Bhagwan Buddha aur Guru Ravidas ji ji Ki Prachar Samgri

List-3 Dr. Ambedkar, Bhagwan Buddha aur Guru Ravidas ji ji Ki Prachar Samgri

List-4 Dr. Ambedkar, Bhagwan Buddha aur Guru Ravidas ji ji Ki Prachar Samgri

List-4 Dr. Ambedkar, Bhagwan Buddha aur Guru Ravidas ji ji Ki Prachar Samgri

List-5 Dr. Ambedkar, Bhagwan Buddha aur Guru Ravidas ji ji Ki Prachar Samgri

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Hindi Books of Dr. Ambedkar

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English Books of Dr. Ambedkar

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Polo T-shirt, Printed, Coloured, of Dr. Ambedkar and Coustamized

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शनिवार, 19 जनवरी 2013

भाग पाँच : कबूतरखाना

उन्निसौ इक्कान्वे में मैं और मेरी माँ बी आठसौ में रहने चले गए। यह पिछली गली में था। माँ ने भी एक झोपड़ा दिलवालों की दिल्ली में बना लिया था। नीचे का कमरा किराये पर दिया था और ऊपर के कमरे में मैं और मेरी माँ। जिस गली में घुसने से डर लगता था अब वह हमारा आशियाना थी। घर के बाजू में कबूतर वालों का घर था जिसमें तीन-चार भाई रहते थे और अपने तीन मंजिला घर के उपर कबूतर पालते थे। कबूतरों के लिए उन्होंने घर की छत पर एक छोटा सा कबूतरखाना बनाया था। जैसे उनके घर में लोग ठूंस-ठूंस कर भरे थे वैसे ही कबूतरखाने में कबूतर। पर सच तो यह है कि सारी गली ही कबूतरखाना बन गई थी। कबूतरों को तो फिर भी सुबह शाम खुल्ली हवा मिल जाती पर हिन्दुओं द्वारा दलितों, अछूतों के लिए बसाई गई दिल्ली की इन जे जे कालोनियों में वह खुल्ली हवा भी नहीं है कि जो कि कबूतरों को मिलती।

मुझे तो यह पिच्च्ली गली समझ में नहीं आई। पर हां एक बात जो समझ में आई वह यह थी कि यहाँ सबका एक बड़ा सपना है कि इस पिछली गली से जल्द-से-जल्द निकलना और जो निकल जाता था उसका न सिर्फ आत्मसम्मान बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठता भी बढ़ जाती थी। उसका आत्मविश्वास इतना बढ़ जाता कि वह जीवन में एक के बाद एक तरक्की करते चले जाता। पर जो नहीं निकल पाए वो कुछ तो एक दम ही नहीं पनपे, कुछ संभले और कम-से-कम अपने मकानों को अच्छा बना लिया और कुछ ऐसे भी हैं जो कि आज भी इसी सपने के साथ जी रहे हैं कि कब इस पिछली गली से छुटकारा मिले। कुछ ऐसे भी हैं जो कि चौड़ी गली से पिछली गली में आ गए और उनके सपने भी उन्हीं को जैसे हो गए जो कि पहले से यहाँ थे। गली में घर से बहार कदम रखो तो ऐसे लगता कि या तो किसी मेले में हो या किसी मच्छली बाज़ार में। कभी-कभी गर्मियों की तेज धूप में गली सूनी हो जाती तो बहुत अच्छी लगती। ऐसे में सब अपने घरों के भीतर होते और शांति का वातावरण हो जाता। तब लगता कि हमारा मादी पुर भी पड़ोस के उन इलाकों जैसा है जहाँ बनिये, पंजाब से आए खत्री, ब्राह्मण आदि हिन्दू, जैनी और ऊँची जाति के सिख रहते हैं। इन वर्गों में से कभी कोई गलती से भी उस पिछली गली में आ जाता तो उसके चेहरे के भाव ही काफी होते जो कि यहाँ रहने वालों का आत्मसम्मान इतना गिरा देते कि वह कभी इन वर्गों के आगे उठ नहीं पाए। यही है हिन्दू धर्म - चंद लोगों का धर्म। न जाने इंदिरा गाँधी के चेहरे पर क्या भाव होंगे जब यह कलोनियाँ उसने बसाई होगी। कश्मीर की उस खूबसूरत ब्राह्मण महिला को ऐसी कलोनियाँ बसाने में क्या खूबसूरती नज़र आई ? और दलितों की अज्ञानता को देखिए कि जिस काँग्रेस और इंदिरा गाँधी ने इन्हें यह झन्नुम दिया यह उसी काँग्रेस के नेता सज्जन कुमार को वोट दे-दे कर बार-बार जितवाते और इंदिरा गाँधी को किसी देवी के जैसे मानते और फिर जब ब्राह्मणों ने जनता पार्टी से भारतीय जनता पार्टी की नींव मजबूत कर काँग्रेस के समक्ष अपना एक और गुट बनाया तो दलित अज्ञानता वश उनके भी दीवाने हो गए। जो दलितों, आदिवासी और पिछड़ों को गंदगी समझ कर दिल्ली से दूर फेंकने का काम ब्राह्मण इंदिरा गाँधी और उसकी पार्टी काँग्रेस ने शुरू किया था वह काम ब्राह्मण अटल बिहारी वाजपेयी और उसकी पार्टी भारतीय जनता पार्टी ने चालू रखा और उसके नेता जगमोहन ने सुन्दरता के नाम पर लोगों को उजाड़ा और और भी घटिया कलोनियों और छोटे मकानों में दिल्ली से दूर फेंक दिया।

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