Printed T-shirt of Dr. Ambedkar Call 8851188170, 8527533051

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Dr Ambedkar aur Bauddh Dhamm par pustak call 8851188170, 8527533051

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Dr. Ambedkar ji ki sankshipt jivani aur unke sandeshon par pustak call M. 8527533051, 8851188170

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Dr. Ambedkar ji Ki Prachar Samgri List-1

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Dr. Ambedkar, Bhagwan Buddha aur Guru Ravidas ji ji Ki Prachar Samgri List-2

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List-3 Dr. Ambedkar, Bhagwan Buddha aur Guru Ravidas ji ji Ki Prachar Samgri

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List-4 Dr. Ambedkar, Bhagwan Buddha aur Guru Ravidas ji ji Ki Prachar Samgri

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Polo T-shirt, Printed, Coloured, of Dr. Ambedkar and Coustamized

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सोमवार, 23 अप्रैल 2018

भाग छह : उनके बच्चे और हमारे बच्चे

उपन्यास का यह छठा भाग मैं पांच वर्ष से भी लम्बी अवधि के बाद लिख रहा हूँ। इन पांच वर्षों में बहुत से सामाजिक और राजनैतिक परिवर्तन देखे। उपन्यास प्रारम्भ करने से पहले जो डॉ. आंबेडकर जी का मिशन मैंने शुरू किया था आज वह मिशन समस्त भारत ही नहीं बल्कि विदेशों में भी आगे बढ़ रहा है। इस दौरान काँग्रेस दस वर्षों के काल के बाद केंद्र की सत्ता से चली गई। दिल्ली में भी काँग्रेस को सत्ता गवानी पड़ी रोहित वेमुला की मौत, गुजरात में दलितों को प्रताड़ित करने वाला ऊना कांड, सहारनपुर में राजपूतों द्वारा दलितों के घरों पर हमला, भीम आर्मी के अध्यक्ष चंद्रशेखर आज़ाद रावण को अभी तक जेल में बंदी बना कर रखना, महाराष्ट्र में शौर्य दिवस के दिन भीमा कोरेगांव की घटना, पदोन्नति में आरक्षण समाप्त करना और अनुसूचित जाति एवं जनजाति संरक्षण कानून को हल्का करना, उन अनेकों मुद्दों में से कुछ ऐसे रहे जिन्होंने लोगों के दिमाग को सोचने पर मजबूर कर दिया और इससे भारत के अनुसूचित जाति एवं जनजाति, पिछड़े वर्गों और अल्पसंख्यकों के लोग संगठित हुए। इसका परिणाम हुआ 2 अप्रैल 2018 का भारत बंद जो कि भारत के मूलनिवासियों के लिए पिछले दो हज़ार वर्षों का वह ऐतिहासिक दिन था जिसे उनकी स्वतंत्रता का दिन कहलाया जाना चाहिए। इस दिन अनुसूचित जाति के दस युवक शहीद हो गए, जिनका उपकार समाज कभी नहीं भूल सकता। इस बंद के में बारे में अधिक क्या कहूं क्योंकि यह सोशल मीडिया और हिन्दू मीडिया पर सबने देखा। बस इतना ही कहूंगा कि जो सबसे ख़ास बात इस बंद की थी वह यह है कि जिस प्रकार हिन्दू मीडिया ने हमारे लोगों को बदनाम किया, उसमें और कुछ नहीं बल्कि इनका छल, कपट, द्वेष और डर साफ झलक रहा था।

तो आज है 23 अप्रैल 2018 और आज के इस अपने छठे अध्याय का विषय मेरे दिमाग में उस दिन आया जब विश्व हिन्दू परिषद के नेता अशोक सिंघल की मौत हुई थी, सन 2015 के अंत में। मेरी विशेष रूचि उसके उपनाम 'सिंघल' में थी। उसकी मौत ने मेरा ध्यान उसके उपनाम की तरफ आकर्षित किया। मुझे याद आए स्कूल के वह दो सहपाठी जिनका उपनाम भी सिंघल था। दोनों बच्चे अमीर घरों से थे। फिर मैंने सोचा कि इस उपनाम वाले और भी हुए, और ऐसे ही अन्य हिन्दुओं के उपनाम वाले भी हैं, पर वह सब बच्चे हमारे बच्चों से भिन्न हैं। उनके बच्चे प्राईवेट अंग्रेजी मीडियम के स्कूलों में पढ़ते, बढ़िया भोजन करते, बचपन से महंगे रेस्टॉरेण्ट्स में जाते, बहुत से बच्चों को तो ड्राईवर विशेष रूप से कार में स्कूल छोड़ने और लेने आते, यह बच्चे महंगी 
टयूशन पढ़ते, मंहगी कोचिंग ले कर इंजीनियरिंग या मेडिकल कालेजों में भर्ती होते या धन के बल पर सीधा सीट पा लेते, महंगे कपड़े पहनते, बचपन में महंगे खिलौने और फिर महंगे वाहन खरीदते, छुट्टियाँ मनाने देश-विदेशों की सैर पर जाते। और हमारे बच्चे ? इन्ही हिन्दुओं के द्वारा संचालित घटिया हिंदी मीडियम के सरकारी स्कूलों में पढ़ते, हमारे बच्चों को आंगनवाड़ी का घटिया खाना मिलता, वह फटे कपड़े पहनते, नाम मात्र की टयूशन और वह भी चंद बच्चों के माँ-बाप ही जुटा पाते, महँगी इंजीनियरिंग और मेडिकल की कोचिंग तो भूल ही जाइए। कुलमिलाकर हमारे बच्चे सामाजिक, शारीरिक, आर्थिक, और शैक्षिक रूप से पिछड़े ही रह जाते हैं।

कुछ वर्ष पहले दिल्ली के रैगरपुरा में रैगर जाती के एक बी.जे.पी. के नेता अपनी ही जाति के बच्चों को मुफ्त उपहार बाँट रहे थे।  मैंने सोचा कि एक तरफ तो हमारे बच्चों का कितना बुरा हाल इन हिन्दुओं की वजह से है और दूसरी तरफ हमारे ही लोग इनकी पार्टियों में जा कर हमारे लोगों के बच्चों को चंद उपहार बाँट कर ऐसा दिखाते हैं कि मानो हम कोई भिखारी हों। इन लोगों को बोलो कि ऐसे उपहार अमीर हिन्दुओं के बच्चों में बांटो। हमारे बच्चों के माँ-बाप इन हिन्दुओं की नौकरी-चाकरी करते हैं पर यह इन्हें कम-से-कम वेतन देते हैं। आखिर यह लोग वेतन बचा कर उसका क्या करते हैं ? हमारे बच्चों के माँ-बाप की मेहनत का पैसा यह अपने व्यवसायों, मकान-ज़मीनों, शेयरों, म्यूचल फंडों, डाक पत्रों, जीवन बीमा आदि में निवेश करते हैं। हमारे बच्चों के माँ-बाप को कम मेहनताना देकर यह जो पैसा बचाते हैं उससे अपने प्राईवेट स्कूल बनाते हैं और इस प्रकार अपने बच्चों की शिक्षा में निवेश करते हैं। इसी प्रकार यह स्वास्थ बीमा में या अस्पतालों में निवेश करके अच्छी स्वास्थ सेवाओं का लाभ उठाते हैं और तंदरुस्त रहते हैं। और अंततः यह अपने धर्म, ब्राह्मण उर्फ़ हिन्दू धर्म में निवेश करके मंदिरों के ट्रस्ट बना कर उसकी कमाई भी खाते हैं। इस प्रकार यह एक कूचक्र है जिसमें हमारे, अर्थात भारत के SC/ST/OBC के बच्चों के माँ-बाप, रोजी रोटी के चक्कर में फंसे रहते हैं और अपने को हिन्दू मानते हैं, पर धर्म की यह साजिश समझ नहीं पाते। और हमारे बच्चे भी अपने माँ-बाप की तरह इसी कुचक्र में फंस जाते हैं और पीढ़ी-दर-पीढ़ी यह कूचक्र आनेवाली हमारी संतानों को अपने में फंसा कर रखते हैं। बाबा साहिब डॉ. भीमराव आंबेडकर जी की वजह से कुछ लोग अच्छा जीवन पा लेते हैं परन्तु वह भी इस धार्मिक साजिश को नहीं समझते और हिन्दू धर्म, अर्थात इस कूचक्र में शामिल हो जाते हैं। वह डॉ. आंबेडकर जी के उपकार से अपना जीवन तो संवार ही लेते हैं पर आगे परोपकार नहीं करते और सामाजिक एकता और अपने स्वयं के संस्थानों का निर्माण नहीं करते। चंद लोग जिन्होंने इस कूचक्र को समझा है वह बाबा साहिब जी के नक़्शे-कदम पर चलते हुए अपनी सफलता में औरों को भी शामिल करते हैं, वह अपनी स्वयं की संस्थाओं का निर्माण करते हैं और भगवन बुद्ध के धम्म का पालन करते हैं। तिब्बत के बौद्धों से हमें शिक्षा लेनी चाहिए। 

तिब्बत के बौद्ध भारत में एक विदेशी है और वह भी वे जो कि अपने देश से निकाले गए यह मजबूरन जिन्हें तिब्बत छोड़ना पड़ा। पर उन्होंने अपने बच्चों के लिए विशाल हॉस्टलों और स्कूलों का निर्माण किया है। वह कम शुल्क में अपने बच्चों को रहने, भोजन और शिक्षा की सुविधा देते हैं। पर हमारे बच्चों के नाम पर हिन्दुओं की सरकार जो करोड़ों-अरबों का पैसा खर्च करने की बात करती है, वह पैसा किसके पास जाता है ? वह उन्हीं व्यापारियों की जेब में जाता है जो स्कूल की इमारत बनाने से लेकर, कॉपी-किताबें, यूनिफॉर्म आदि बेचते हैं। इनमें से अधिकांश्तर हिन्दू, जैनी, पारसी या सिख  ही होते हैं। अध्यापक भी अधिकांश्तर हिन्दू ही होते हैं जो मोटी तनखाएं लूटते हैं। यदि SC/ST/OBC के चंद अध्यापकों को भी यह मोटी आमदनी मिलती भी है तो भी यह कुल राशि भी उस राशि के मुकाबले बहुत कम है जो कि शिक्षा के व्यापार में हिन्दुओं, जैनियों, सिखों और पारसियों की जेब में जाती है। इतनी छोटी राशि से SC/ST/OBC के लोग वह कोई सामाजिक परिवर्तन नहीं ला सकते जिससे इन वर्गों के सभी बच्चों का कल्याण हो। ऐसे भी इस कूचक्र को नहीं तोड़ा जा सकता। पर अफ़सोस तो यह भी है कि यह अध्यापक इस बारे में प्रयास भी नहीं करते। इस प्रकार हमारे बच्चों की शिक्षा के नाम पर खर्च होने वाला अरबों रुपया कुलमिलाकर हिन्दुओं के जेब में ही वापिस चला जाता है। 

यदि हम तिब्बत के बौद्धों से शिक्षा लें तो शायद अपनी आनेवाली संतानों का भविष्य बेहत्तर बना सकते हैं। हमें तिब्बत के बौद्धों के साथ मिलकर उनकी संस्थाओं का और अधिक विकास करना चाहिए जिससे कि उनकी संस्थाएं और अधिक उन्नत हों और बौद्ध शिक्षा के साथ आधुनिक शिक्षा भी मिल सके। हमें अपने बच्चों को तिब्बत के बच्चों के साथ उनके स्कूलों में पढ़ना चाहिए। इस प्रकार न केवल हम तिब्बत के बौद्धों से जुड़ेंगे बल्कि अपने बच्चों को भी बौद्ध शिक्षा दे पाएंगे। हो-न-हो तिब्बत के लोगों की इस एकता, लगन, कर्मठता, दृढ़ निश्चय और जुझारूपन का कारण उनकी बौद्ध धम्म की शिक्षा ही है। और यदि हमारी आनेवाली पीढ़ी में भी यह शिक्षा आएगी तो वें अपना भविष्य बेहत्तर बना पाएंगे। तिब्बत के लोगों के साथ जुड़ने का एक महत्वपूर्ण कारण यह भी है कि यदि हम उनके साथ मिल कर रहते हैं और आने वाले समय में तिब्बत चीन से अपनी स्वतंत्रता वापिस ले लेता है तो भविष्य में हमारे और हमारे राष्ट्र के तिब्बत से और अच्छे सम्बन्ध बनेंगे। और तिब्बत न केवल बौद्ध धम्म की संस्कृति का भण्डार है बल्कि औषधि विज्ञान, पर्यटन की दृष्टी के साथ-साथ खनिजों से भरपूर राष्ट्र है। साथ ही तिब्बत की भौगौलिक स्थिति ऐसी है कि वहाँ से समस्त एशिया को नियंत्रित किया जा सकता है और इससे चीन के बढ़ते प्रभाव को भी कम किया जा सकता है, जिससे कि हमारे देश को और अधिक सुरक्षित बनाया जा सकता है।  

1 टिप्पणी:

  1. भाई जी।

    भगवान बुद्ध की कल्याणी विपश्यना साधना का रस अवश्य चखें।
    www.dhamma.org

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